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Thursday, 28 January 2010

आपने पूछा

ये शब्द इतने रूखे क्यों हैं
जज़बात इतने सूखे क्यों हैं
इन पर घी क्यों न लगाया
इन्हें मुलायम क्यों न बनाया

वाक्यों में लचक नहीं
ख्यालों में चहक नहीं
इनमे मसाला क्यों न मिलाया
इन्हें चटपटा क्यों न बनाया

मुहावरों की खलती है कमी
भावनाओं में नहीं है नमी
अलंकार गए हैं थम
चीनी है ज़रा कम

वाचकजी नमस्कार
ध्यान रखूँगा आपका स्वाद
आलोचना के लिए धन्यवाद
पेश है एक विनम्र प्रतिवाद

तथ्यों की परोसदारी है
दृष्टिकोण से सँवारी है
बेहद पौष्टिक खाना है
हैल्दी फ़ूड का ज़माना है

सौरभ सेठिया
२८ जनवरी २०१०

Tuesday, 29 December 2009

माटी और गुलाब

माना की हैं माटी हम
नहीं हैं फूल गुलाब से
जाना की है मदहोश ज़माना
गुलाब के ही सौरभ से

सुनो पर हम निराश नहीं हैं
डटे रहेंगे विश्वास से
गरजेंगे बस कर्म के बादल
संकल्प हमारा आप से

भीगेगी जब सारी धरती
बरखा की इक फुहार से
महकेगा तब यही ज़माना
सौंधी-सौंधी बहार से

सौरभ सेठिया
३ अप्रैल १९९४