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Thursday, 19 August 2010

पीपली [Live]

पीपली लाइव बहुत अच्छी लगी.  इसे जरूर देखें.  पर ये बच्चों के लायक नहीं है क्योंकि इसमें गालियाँ बहुत हैं.  परिवार के साथ देखना भी मुश्किल है.  कुछ जगह तो लगा कि गालियाँ वास्तविकता दर्शाने के लिए जरूरी थी पर कहीं कहीं मुझे लगा कि गालियाँ सिर्फ दर्शकों को हसाँने के लिए डाली गयी हैं.  फिल्म में जब भी कोई गाली देता है, थियेटर में दर्शक जोर-जोर के हँसते हैं.  कुछ गालियाँ दर्शकों के इस रुझान के लिए डाली गयी लगती हैं.

फिल्म में हर किरदार के लिए बहुत उपयुक्त कलाकार को लिया गया है.  फोटोग्राफी बहुत अच्छी है.  और अधिक मैं नहीं लिखूंगा, आप खुद ही देख लें.

रेटिंग: ****

Once upon a time in Mumbai

ये फिल्म सिर्फ अजय देवगन के प्रशंसकों के लिए ठीक है.  जब तक अजय देवगन स्क्रीन पर रहता है फिल्म को झेलते बनता है.  रोमैंटिक सीन्स में तो देवगन भी बोर करता है.  टाइम पास के लिए फिल्म ठीक है.

रेटिंग: **

Friday, 5 February 2010

इश्किया

परसों इश्किया देखी.  कुल मिलाकर कहूँ तो अच्छी नहीं लगी.  फिल्म अच्छी नहीं लगी.  विद्या बालन बहुत अच्छी लगी.  शायद ये विद्या बालन की पहली फिल्म है जिसमे वह मुझे ख़ूबसूरत लगी.  विद्या बालन, नसीरुद्दीन शाह, और अरशद वारसी तीनो ने बहुत बढ़िया काम किया है.  अगर आप फिल्म किरदारों को देखने जाते हैं, तो ये फिल्म आपको बहुत पसंद आएगी.  फिल्म में कहानी है.  बिलकुल है.  और बड़ी घुमावदार है.  पर ऐसा नहीं लगता की फिल्म कहानी सुनाने के लिए बनायी गयी है.  यूँ लगता है की फिल्म तीन किरदारों और उनके बीच की कामुकता को दिखाने के लिए बनायी गयी है.  जिसमे वह सफल है.  कहानी ज़रूरी है इसलिए है.

फिल्म में फोटोग्राफी अच्छी है.  "दिल तो बच्चा है जी..." गीत का मुखड़ा कर्णप्रिय है.  अन्य गीतों की तरफ मेरा ध्यान नहीं गया.  फिल्म परिवार के साथ देखने योग्य कदापि नहीं है.

रेटिंग: **

Saturday, 16 January 2010

थ्री इडियट्स और बहुत अच्छी बन सकती थी

थ्री इडियट्स में बहुत कुछ बहुत अच्छा था पर कई जगह फिल्म ने मुझे बोर किया.  कई जोक्स बहुत पुराने थे.  विभिन्न किरदारों का बार-बार पैंट उतारना थोड़ा ज्यादा हो गया.  "आल इज वैल" बढ़िया लगा.  हमेशा की तरह बोमन ईरानी ने जोरदार अभिनय किया है.  तीनो इडियट्स अच्छे लगे.  आमीर के कारण फिल्म चल रही है वरना फिल्म की कहानी कुछ ख़ास नहीं है.  फिल्म का सन्देश अच्छा है पर कोई-कोई सीन जरूरत से ज्यादा लंबे खिच गए हैं.  फिल्म में फोटोग्राफी सुंदर है, पर कई जगह सिर्फ अच्छे सीन दिखाने के लिए कहानी को शिमला और लद्दाख ले जाया गया है.

रेटिंग: ***

समीक्षा: पा की कहानी में दम नहीं है

फिल्म पा में कोई कहानी ही नहीं है.  अमिताभ के लिए एक ख़ास किरदार सोचा गया और फिर उसके इर्दगिर्द एक अविश्वसनीय कहानी बुन दी गयी.  कहानी फिर भी छोटी पड़ी तो अभिषेक बच्चन के किरदार को युवा नेता बना कर राजनीती पर टिप्पणियां की गयी जिसका बाकी कहानी से कोई सरोकार नहीं है.  फिर भी फिल्म किसी-ना किसी तरह दर्शकों को बांधे रखती है.  फिल्म अगर डेढ़ घंटे की बनाते तो शायद बहुत अच्छी बनती.  अमिताभ का मेकअप अच्छा है.  अभिनय ठीक है.  कोई शिकायत नहीं पर तारीफ़ करने जैसा भी कुछ नहीं.  अभिषेक और विद्या बालन अच्छे लगते हैं.  परेश रावल का काम ना के बराबर है.

रेटिंग: ***